jeen mata ji
Darshan Timings: -
About the Temple
The Shree Jeen Mata Mandir Trust was established in 1985 with the noble mission of preserving and promoting the spiritual heritage of this sacred temple. The trust is committed to: • Maintaining and developing the temple infrastructure with modern facilities while preserving ancient traditions • Organizing religious festivals, grand celebrations, and spiritual programs throughout the year • Providing comfortable accommodation, prasad facilities, and darshan arrangements for devotees • Supporting local community development initiatives, educational programs, and charitable activities • Preserving the temple's ancient traditions, rituals, and ensuring proper conduct of daily puja and aarti ceremonies • Managing the temple website and digital services to connect with devotees worldwide
Temple History
लोक काव्य, गीतों व कथाओं में श्री जीण माता को शक्ति और उनके बड़े भाई हर्ष को भगवान शिव का अवतार माना गया है। लोक कथाओं के अनुसार श्री जीण माता ने राजस्थान के चूरू जिले के घांघू गांव के अधिपति एक चौहान वंश के राजा घंघू (गंगो सिंह) के घर में जन्म लिया जिसे राजा घंघू सिंह (गंगो सिंह) ने विक्रम संवत 150 के लगभग बसाया था। घंघू सिंह (गंगो सिंह) प्रजापालक व दयालु थे। परन्तु वे निःसंतान होने के कारण उदास रहते थे। एक दिन राजा शिकार की तलाश में अरावली पर्वतमाला के घने जंगलों को पार कर पहाड्रियों के मध्य पहुंच गए। वहां पर कुछ दूरी पर एक मन्दिर दिखाई पडा जो जयन्ती महाभागा सिद्ध पीठ का स्थान था और जिसका उल्लेख प्राचीन ग्रन्थों में मिलता है। शिव पुराण में भी इसका वर्णन 52शक्ति पीठों में है। माना जाता है कि पाण्डवों ने अज्ञातवास के दौरान कुछ समय यहाँ बिताया था। राजा घंघू सिंह (गंगो सिंह) ने वहाँ पवित्र जल-कुण्ड के पास एक साधु को तपस्या करते हुए देखा। उस स्थान पर उगे झाड-झंझाड को अच्छी प्रकार से साफ़ कर तपस्या में लीन साधु की सेवा करने लगे। एक दिन महात्मा ध्यान से बाहर आये और वहां की साफ़ सफाई को देखा। राजा शिवलिंग के स्नान में ध्यान-मग्न थे। लेकिन उन साधु महात्मा के तपस्या से उठने का ज्ञात होने पर राजा ने महात्मा के चरणों में प्रणाम कर अपना परिचय दिया। महात्मा ने राजा की सेवा से प्रसन्न होकर उन्हें एक पुत्र और पुत्री प्राप्ति का वरदान दिया। राजा मन ही मन बहुत प्रसन्न हुए और महात्मा से आशीर्वाद लेकर वहां से प्रस्थान किया। देवता भी भलीभांति जानते थे कि इस शक्ति पीठ से मिले वरदान से राजा को कोई असाधारण संतान की प्राप्ति ही होगी। इसलिए उन्होंने सोचा कि राजा का विवाह किसी दैवीय शक्ति से हो जो दैवीय संतान को जन्म दे सके। राजा शक्ति पीठ से अपनी राजधानी वापस लौटते समय इसी पर्वतमाला में स्थित मा शाकम्भरी शक्ति पीठ पहुँचे। वहाँ जल-कुण्ड में एक स्त्री को डूबते हुए राजा ने बचाया जो वास्तव में एक अप्सरा थी। राजा के विवाह प्रस्ताव को अप्सरा ने एक वचन के साथ स्वीकार किया कि जिस दिन बिना सूचना के राजा उसके कक्ष में प्रवेश करेंगे,तो वो उनके जीवन से वापस चली जाएँगी। और इस शर्त के साथ राजा ने अप्सरा के साथ विधिवत विवाह कर लिया। समयोपरान्त राजा घंघू सिंह (गंगो सिंह) के घर हर्षोल्लास की घडी आई जब अप्सरा के गर्भ से पुत्र ने जन्म लिया। हर्षोल्लाष के उन क्षणों में राजा ने पुत्र का नाम भी 'हर्ष' रखा। दूसरी संतान के रूप में एक कन्या ने भी जन्म लिया और इस तरह राजा को मिले दोनों वरदान पूरे हो गए। चूँकि कन्या प्राप्ति का वरदान निर्जन स्थान पर मिला था, अतः नामकरण 'जीण' किया गया जिसका शाब्दिक अर्थ है - एकान्त, शून्य, जंगल आदि। एक दिन बिना किसी सूचना के राजा ने रानी के कक्ष में प्रवेश कर लिया। राजा ने विस्मयपूर्वक देखा कि वहां पर एक शेरनी बैठी है और आस-पास बच्चे खेल रहे हैं। तब शेरनी ने रानी के स्वरूप में आकर कहा, महाराज आपने अपने दिए वचन को तोड़ दिया है इसलिए में आज पुनः इन्द्रलोक को प्रस्थान कर रही हूँ। इतना कहकर रानी अदृश्य हो गई।रानी के वियोग में राजा बीमार पइ गए और अपनी मृत्यु को समीप देखते हुए हर्ष का छोटी उम्र में ही विवाह कर दिया। हर्ष ने पिता को आश्वस्त किया कि वो बहन जीण को सदा ही प्रसन्न रखेगा और तत्पश्चात राजा का देहांत हो गया। हर्ष के विवाह के लम्बे अंतराल के बाद भी हर्ष एवं जीण दोनों भाई-बहन के बीच प्रेम कम नहीं हुआ। जीण भाई-भाभी दोनों की लाडली बनी हुई थी। लेकिन जिस उद्देश्य से जीण व हर्ष ने धरती पर अवतार लिया था, उसे पूरा करने का भी उचित समय आ रहा था। इसलिए जीण और हर्ष के अनुपम और निश्छल प्रेम को देखकर भाभी ईर्ष्या करने लगी। उन्हीं दिनों भाभी के मन में विचार आया कि उनके पति हर्षनाथ उनसे अधिक अपनी बहिन जीण को प्रेम करते हैं। एक दिन जीण और उसकी भाभी (भावज) की सरोवर पर किसी बात को लेकर तकरार हो गई। शर्त लगी कि दोनों पानी के मटके घर ले जाएँगी और जिसका मटका हर्ष पहले उतारेगा, उसके प्रति ही हर्ष का अधिक स्नेह समझा जाएगा। दैव योग से हर्ष ने पहले मटका अपनी पत्नी का उतारा। इस घटना ने भाई-बहन के प्रेम में ज़हर घोल दिया और उसी क्षण जीण के मन में वैराग्य उत्पन्न हो गया। जीण की यह दशा देख भाभी ने संदेह में जीण को अमर्यादित वचन कह दिए। माँ समान भाभी के इस बर्ताव के बाद जीण अपने पिता की विरासत को छोड़ वन जंगल की ओर निकल गईं।
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